Tuesday , 29 September 2020

कंगाली के द्वार पर राजस्थान सरकार, खाते में सिर्फ 50 करोड़

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phpThumb_generated_thumbnail (2)एजेंसी/राज्य के आर्थिक हालात चिंताजनक हैं। रिजर्व बैंक में राज्य सरकार के खाते में महज 50 करोड़ रुपए बचे हैं। एेसे में आमजन की शिक्षा और सेहत सहित अन्य विकास योजनाओं पर कैंची चलना तय है। राज्य सरकार द्वारा मंगलवार को पेश बजट में राज्य के यही हालात बयां हो रहे हैं। सरकार ने आगामी बजट में विश्वविद्यालयों को मदद के साथ रोजगार, पेयजल, शहरी विकास, सड़क, ग्रामीण पर्यटन, स्वास्थ्य, गरीबों को आवास से लेकर खेल तक की अनेक योजनाओं पर खर्च घटाने की मंशा भी जाहिर कर दी है।

सरकार के खाते में पिछले साल 1 अरब 16 करोड़ रुपए शेष थे। इस बार लक्ष्य 2 अरब 90 करोड़ से ऊपर ले जाने का था।  अब हालत विपरीत हैं। रिजर्व बैंक में सरकार की नकदी बढऩा तो दूर घटकर आधी से भी कम रह गई है। वर्तमान सरकार के पास 50 करोड़ 65 लाख रुपए की नकदी ही शेष है। इस बार भी सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष में जमा शेष को एक अरब 29 करोड़ रुपए से अधिक करने का संकल्प किया है। अहम यह भी है कि सरकार इस बार बेहद घाटे में है। राजकोषीय घाटा 9.9 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। जबकि कानूनन यह 3 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

यहां भी की गई कटौती

इसी प्रकार उदयपुर के कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि, बीकानेर के स्वामी केशवानंद विवि, नर्मदा परियोजना व लघु सिंचाई कार्ययोजना, पर्यटन स्थलों के विकास और राजीव गांधी खेल अभियान को भी तय बजट से कम राशि मिलेगी। अन्तरजातीय विवाह, सड़क आधुनिकीकरण, मनरेगा, नि:शुल्क दवा और नि:शुल्क जांच योजना, कौशल एवं आजीविका मिशन, बेरोजगारी भत्ता योजना, ग्रामीण न्यायालय के बजट में भी कटौती की गई है।

विकास पर कम होगा खर्च

राज्य सरकार कच्चे तेल की कीमत में कमी, केन्द्र  से मिलने वाली हिस्सा राशि घटने और बिजली कंपनियों के घाटे के भार के कारण आर्थिक हालात बिगडने का तर्क दे रही है। जमीनी हकीकत यह है कि कई योजनाओं में तो आवंटित बजट खर्च ही नहीं हुआ है। संशोधित बजट अनुमान में कई योजनाओं का आकार भी घटाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार योजनाओं को धन मिले या नहीं मिले, लेकिन जो मिला है उसे खर्च करना ही समझदारी है। सरकार ने गत वर्ष बजट में राजस्व जुटाने का जो लक्ष्य तय किया था, वह भी इस बार पूरा नहीं हो सका।

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जन योजनाओं पर चलेगी कैंची

 इस पैसे से तो वेतन बांटना ही मुश्किल होगा। उत्पादकता पर जोर के साथ उपयोगिता भी दिखनी चाहिए। पिछली घोषणाएं पूरी नहीं हुई। एनआरएचएम, सर्व शिक्षा, कौशल विकास पर खर्च कम किया।

एन.एम. यादव, बजट विशेषज्ञ और भारतीय लेखा सेवा के पूर्व अधिकारी

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