Monday , 6 July 2020

सूखी पराली की लुग्दी से तैयार किए डिस्पोजेबल बर्तन, बढ़ेगी किसानों की आय

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‘आम के आम गुठलियों के दाम’ और वह भी उस पराली के लिए जो पूरे उत्तर भारत में प्रदूषण का प्रमुख कारण बनी हुई है। अब यही पराली किसानों के लिए आय का साधन बनेगी। रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में संचालित एग्री बिजनेस इंक्यूबेटर में इंदौर के युवा दंपती प्रदीप पाण्डेय और पूजा पाण्डेय ने पराली से डिस्पोजबल बर्तन तैयार किया है। साथ ही, एग्रो स्टार्टअप भी शुरू किया है और किसानों को इसे लघु उद्योग के रूप में स्थापित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

मालूम हो कि फसलीय अवशेष विशेषकर पराली का निस्तारण बड़ी समस्या बनी हुई है। कुछ जगहों पर किसान इसे जला देते हैं, जो प्रदूषण का बड़ा कारण बन रहा है। प्रदीप पाण्डेय बताते हैं कि ऐसे में हमने प्लास्टिक से तैयार डिस्पोजेबल को चुनौती मानते हुए पराली से डिस्पोजेबल बर्तन तैयार किया है। यह स्वत: गल जाएगा और इससे खाद भी बनाई जा सकती है।

ऐसे होता है तैयार

प्रदीप ने बताया कि पराली को पानी में डुबो कर एक से दो दिन रखने के बाद उसकी लुग्दी तैयार की जाती है। लुग्दी से आसानी से डिस्पोजेबल बर्तन तैयार किया जा सकता है। इसके लिए अलग से मशीन की जरूरत नहीं पड़ती। कागज के डिस्पोजेबल बनाने वाली मशीन से ही यह बन सकता है। इससे कप, गिलास, थाली, प्लेट, कटोरी भी बनाई गई है।

नालियां नहीं होगी जाम

प्लास्टिक से बने डिस्पोजेबल कप, प्लेट आदि के कारण नालियां जाम हो जाती थीं, लेकिन पराली से तैयार ये सामान नालियों को साफ करने का काम करेंगे। ये डिस्पोजेबल बर्तन नाली में जाते ही लुग्दी बन जाते हैं और उसमें मौजूद गंदगी को अपने साथ लपेट लेते हैं। जब उसे बाहर निकालते हैं तो नाली पूरी तरह से साफ हो जाती है। प्रदीप कहते हैं कि अगर तालाब की सफाई करनी है तो उपयोग किए जा चुके पराली के डिस्पोजेबल बर्तन को उसमें फेंक दें। 12 घंटे के बाद निकालने से तालाब पूरी तरह से साफ हो जाएगा।

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तैयार हो जाएगी जैविक खाद

पराली के डिस्पोजेबल से खाद भी तैयार की जा सकती है। अगर इसके साथ गोबर को मिला दिया जाए तो 10 से 15 दिन में खाद बन जाती है।

दिल्ली के लिए फायदेमंद

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इन दिनों प्रदूषण की समस्या से परेशान है। वहां से सटे हरियाणा और पंजाब के इलाकों में किसान फसल काटने के बाद पराली खेतों में जला देते हैं, जो प्रदूषण का बड़ा कारण माना जा रहा है। वहां भी यह फार्मूला काम आ सकता है।

प्रदीप और पूजा ने पराली से डिस्पोजेबल बनाने का नवाचार किया है। इसके लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय स्थित एग्री बिजनेस इंक्यूबेटर में उन्हें सभी सुविधाएं मुहैया कराई गई है। अब इसे बड़े रूप में तैयार करने की योजना है।

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