Monday , 14 October 2019

टिहरी स्थित टीएचडीसी संस्थान में नियुक्तियों पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं, पढ़िए पूरी खबर

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टिहरी स्थित टीएचडीसी हाइड्रोपावर अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान में नियमित नियुक्तियों को सरकार ने न्यायालय में स्वीकार किया है। संस्थान के प्रोफेसर अरविंद कुमार सिंह के नेतृत्व में 15 शिक्षकों ने अपनी नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज की थी।

विदित रहे कि उच्चतम न्यायालय में अवमानना की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान उत्तराखंड सरकार व निदेशक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को पूर्व में ही नियमित किया जा चुका है अत: इनकी नियमित नियुक्तियों पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं है, जबकि सरकार की तरफ से प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा व निदेशक टीएचडीसी हाइड्रोपावर अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान ने शपथ के साथ उच्चतम न्यायालय में जवाब दाखिल किया था कि उच्च न्यायालय की ओर से एक दिसंबर 2015 को पास किया गया फैसला गलत है। 

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वरिष्ठ अधिवक्ता ने उच्चतम न्यायालय को स्पष्ट किया कि जब उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका पर सुनवाई चल रही थी तभी निदेशक ने बिना शर्त मांफी मांगी थी व नियमित नियुक्तियां प्रदान की थीं। जिसे स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय ने निदेशक के विरुद्ध दाखिल चार्जशीट को खारिज कर दिया था व नियमित नियुक्तियों को स्वीकार करते हुए शेष लंबित पड़े हुए मांगों के लिए दूसरी याचिका फाइल करने का आदेश दिया था। परन्तु दूसरी याचिका फाइल करने के बजाय याचिकाकर्ताओं ने अवमानना की विशेष अनुमति याचिका उच्चतम न्यायालय में दाखिल कर दी जिसे उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार करते हुए संबद्ध पक्षों को नोटिस भेजा था। 
बीते 30 सितंबर 2019 को अवमानना की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने उत्तराखंड सरकार व निदेशक की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता कि इस दलील को स्वीकार कर लिया कि याचिकाकर्ताओं को नियमित किया जा चुका है व यह फैसला भी दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को कोई ग्रीवांस हैं तो उसे उचित फोरम पर वैधानिक तरीके से अपनी मांग के साथ रख सकते हैं।

याचिकाकर्ता टीएचडीसी हाइड्रोपावर अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रोफेसर डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने उच्चतम न्यायालय के फैसले की प्रति जारी करते हुए कहा कि यह तो सरकार की ओर से एक प्रकार की धोखाधड़ी साबित हो रही है। सरकार पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलती है और जब सुनवाई के दौरान फजीहत की नौबत आती है तो अब जाकर मजबूरन रास्ते पर आती है। 

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