Friday , 3 April 2020

जिला कारागार में कैदियों के बीच माना जा रहा संघर्ष के पीछे वर्चस्व…..

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जिला कारागार में कैदियों के बीच संघर्ष के पीछे वर्चस्व को भी माना जा रहा है। हालांकि, जेल प्रशासन इससे साफ इन्कार कर रहा है, लेकिन यह बात आसानी से गले नहीं उतर रही कि संघर्ष केवल इस बात पर हुआ कि ज्ञानचंद ने आनंद को बासी खाना फेंकने के लिए कहा। अब सच यही है, या कुछ और यह तो मजिस्टे्रटी और विभागीय जांच की रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल प्रेमनगर पुलिस जल्द ही आनंद को रिमांड पर लेकर पूछताछ करने की तैयारी में है।

जेल में कैदियों के बीच मामूली सी बात को लेकर हुए खूनी संघर्ष से जेल और पुलिस प्रशासन सकते में है। जेल प्रशासन का दावा है कि ज्ञानचंद और आनंद सिंह काफी दिनों से बैरक नंबर 7-ए में एक साथ रह रहे थे। कभी कोई ऐसी बात सामने नहीं आई, जिससे यह संदेह हो कि दोनों में किसी तरह की अदावत चल रही हो।

अब सवाल यह भी है कि आनंद सिंह केवल बासी खाने को बैरक से बाहर फेंकने पर क्यों ज्ञानचंद पर हमलावर हो गया। जाहिर है दोनों के बीच कुछ न कुछ तो ऐसा था, जो रविवार को खूनी संघर्ष में बदल गया। जेल प्रशासन इसका पता लगाने की कोशिश में जुट गया है, लेकिन अधिकारी जांच का हवाला देकर अभी कुछ भी बताने से बच रहे हैं।

बैरक के कैदियों के भी होंगे बयान

पुलिस घटना के पीछे के असल कारणों का पता लगाने के लिए उन कैदियों के भी बयान लेगी, जो रविवार दोपहर में घटना के समय बैरक में मौजूद थे। एसओ प्रेमनगर धर्मेंद्र रौतेला ने बताया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आरोपित आनंद सिंह को भी कस्टडी रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी।

कत्ल की सजा भुगत रहा है आरोपित  

कैदी ज्ञानचंद की हत्या के आरोपित आनंद सिंह पर वर्ष 2004 में पिथौरागढ़ के बेरीनाग में हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था। उस पर आरोप है कि पुरानी रंजिश में एक व्यक्ति के सिर पर डंडे से वार कर दिया था, जिसमें उसकी मौत हो गई थी।

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गवाहों और सबूतों के आधार पर वर्ष 2005 में सजा सुनाए जाने के बाद उसे हरिद्वार जेल में निरुद्ध कर दिया गया। हरिद्वार से उसे वर्ष 2015 में देहरादून जेल शिफ्ट कर दिया गया। आनंद चौदह साल सजा काट चुका है। वहीं, ज्ञानचंद पर नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में रुद्रप्रयाग की अदालत ने दस साल की सजा सुनाई थी। वर्ष 2015 में उसे चमोली जेल से देहरादून शिफ्ट किया गया था।

..तो अंदरखाने ही दब जाती घटना

जेल प्रशासन ने रविवार को कैदियों के बीच हुए खूनी संघर्ष की जानकारी स्थानीय पुलिस को नहीं दी। घटना की जानकारी बुधवार को भी पुलिस को न मिलती, वह तो ज्ञानचंद की मौत के बाद जेल प्रशासन के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा और मजबूरन पुलिस को न सिर्फ घटना की जानकारी दी, बल्कि मुकदमा भी दर्ज कराया गया।

यह था मामला 

रविवार की दोपहर बैरक में रखे बासी खाने को फेंकने के लिए ज्ञानचंद ने आनंद सिंह को कहा। इस पर आनंद आगबबूला हो उठा। बोला कि वह कौन होता है उसे आदेश देने वाला। इस पर ज्ञानचंद ने भी प्रतिकार किया तो आनंद ने ज्ञानचंद के वॉकर को खींच लिया। इससे ज्ञानचंद जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद आनंद ने उस पर लात-घूंसे से हमला कर दिया। ज्ञानचंद ने भी बचाव की कोशिश की और शोर मचाया।

बैरक से आ रही चीख-पुकार को सुनकर गश्त कर रहे बंदी रक्षक दीपक बलूनी ने अन्य कैदियों की मदद से दोनों को अलग किया। जेल प्रशासन ने लहूलुहान ज्ञानचंद को जेल अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन हालत गंभीर देख उसे दून मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। यहां से उसे सोमवार को ऋषिकेश एम्स रेफर कर दिया गया। जहां उसकी मौत हो गई।

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