Thursday , 1 October 2020

चीन को रोकने के लिए भारत-जापान साथ हुए

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andaman_landscape_1457814102एजेंसी/हिंद महासागर में चीन की समुद्री पहुंच को रोकना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में ढांचागत विकास को लेकर भारत और जापान के बीच गंभीर बातचीत शुरू हो चुकी है।

इस चुनौती से निपटने के लिए जापानी विदेश मंत्रालय को दक्षिण अंडमान द्वीप में पहले 15 मेगावाट डीजल पावर प्लांट प्रोजेक्ट पर पिछले माह एक प्रस्ताव भी दिया जा चुका है। इस प्रस्ताव पर जापान आगामी वर्ष में अप्रैल से काम शुरू कर देगा। मलक्का का पश्चिमोत्तर हिस्सा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह हैं, जहां से चीन के समुद्री विस्तार पर बड़ी हद तक नियंत्रण लगाया जा सकता है।

समुद्र में इसे लेकर चीन सबसे ज्यादा संवेदनशील रहा है। चीन के लिए यह इलाका काफी महत्व का है, क्योंकि वह यहां अपनी नौसेना का विस्तार करना चाहता है। दरअसल, यह इलाका मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच दक्षिण अफ्रीका व मध्य-पूर्व से ईंधन लाने ले जाने में चीन के सामरिक महत्व का मार्ग है। हालांकि चीन के ‘वन बेल्ट, वन रोज’ प्रोजेक्ट की अपेक्षा इस इलाके में फिलहाल जापान की सहायता ने कम ध्यान आकर्षित किया है।

‘वन बेल्ट, वन रोड’ परियोजना का लक्ष्य चीन को सड़क, रेलवे और बंदरगाह के नेटवर्क से पूरे एशिया और यूरोप से जोड़ने की कोशिश है। लेकिन टोक्यो ने कहा है कि इस द्वीप पर प्रस्तावित पावर प्लांट के लिए जापान का सहयोग काफी आगे की सोच है, और वह फिलहाल छोटे प्रोजेक्ट पर काम शुरू करेगा। जापान का इरादा धीरे धीरे बड़ी योजनाओं पर काम शुरू करने का है।जापान और भारत के बीच गहरे संबंध रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम, असम और मेघालय के सीमावर्ती इलाके में जापान 74.4 करोड़ डॉलर के सड़क निर्माण प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग भी कर रहा है। पूर्वोत्तर क्षेत्र की तरह अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह भी एक सामरिक क्षेत्र है, जो अपेक्षाकृत अविकसित रह गया है। इसी नीति के तहत भारत के साथ अब वह दक्षिणी अंडमान में पुल और बंदरगाह विकास के लिए वित्तीय सहयोग भी कर रहा है।

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वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्षेत्र में चीन का प्रभाव रोकने के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका समेत क्षेत्रीय ताकत माने जाने वाले वियतनाम के साथ करीबी संबंध बनाना शुरू कर दिया है।

इस कारण भारत में सामरिक महत्व के प्रोजेक्ट और अधिक तर्कसंगत बन गए हैं। एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने बताया कि चीन के प्रोजेक्ट का जवाब अधिक से अधिक देशों को संगठित करके दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि अंडमान में प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के माध्यम से भारत अपने फ्रंटियर क्षेत्र विकसित करना चाहता है। 

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